कश्मीर की हसीन वादियों में फिर से गूंजेगी ‘लाइट, कैमरा और एक्शन’ की आवाज

कश्मीर की हसीन वादियों में फिर से गूंजेगी ‘लाइट, कैमरा और एक्शन’ की आवाज

जम्मू-कश्मीर को भारत का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है. यही वजह है कि बॉलीवुड को ये जगह बेहद पसंद है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने संदेश में कश्मीर और सिनेमा के रिश्तों का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि कैसे आर्टिकल 370 और आतंकवाद ने इस रिश्ते में दरार डाली दी थी. पीएम मोदी ने उम्मीद जताई है कि अब कश्मीर एक बार फिर से फिल्मों की शूटिंग का अंतरराष्ट्रीय हब बन जाएगा यानी यह साफ है कि एक बार फिर से कश्मीर की हसीन वादियों में लाइट, कैमरा और एक्शन की आवाज गूंजने वाली है।

1960, 70 और 80 के दशक तक कश्मीर सिनेमा के पर्दे पर भारत की पहचान बनकर छाया रहा. कश्मीर के शिकारों से मोहब्बत की जो दास्तां शुरू होती थी, वो देवदार के पेडों के बीच से होती हुई हिमालाय की ऊंचाइयां हासिल कर लेती थी. कहानियां फिल्मी होती थीं, लेकिन कश्मीर का किरदार अमर हो जाता था. लेकिन, धीरे-धीरे दहशतगर्दी और धारा 370 के साएं ने फिल्मी दुनिया को कश्मीर की वादियों से दूर कर दिया, हालांकि देश के नाम संबोधन में पीएम मोदी ने उम्मीद जताई है कि हालात बेहतर होने पर कश्मीर एक बार फिर फिल्मों की शूटिंग का केंद्र बन जाएगा।

भारत में लोग गंगा को पवित्र नदी मानते हैं, लेकिन फिल्म अभिनेता शम्मी कपूर के लिए डल झील गंगा नदी की तरह थी. उनको डल झील से इतनी मोहब्बत थी कि उनकी इच्छा के मुताबिक उनकी अस्थियों का विसर्जन भी डल झील में ही किया गया था, लेकिन धीरे-धीरे आतंकवाद के राहू ने कश्मीर में फिल्मों पर ग्रहण लगा दिया. 28 सालों के दौरान आतंकवाद ने सिनेमा हॉल्स की भी बलि ले ली. 1980 के दशक में कश्मीर में कुल 15 सिनेमा हॉल चल रहे थे जिसमें से 9 श्रीनगर में थे. 1989 के साल की गर्मियों की बात है जब अल्लाह टाइगर्स नाम के एक कट्टरपंथी गुट ने कश्मीर घाटी के सिनेमा हॉल्स को बंद करने की धमकियां दी थीं. आतंकवादियों ने सिनेमा को इस्लाम के खिलाफ करार दिया था।

पहली बार एक जनवरी 1990 में वो दिन था जब कश्मीर में एक भी सिनेमा हॉल पर फिल्म नहीं लगी थी. पलेडियम सिनेमा कश्मीर के मुख्य सिनेमाघरों में से एक था. एक जमाना था जब राज कपूर, दिलीप कुमार और और राज कपूर जैसे अभिनेताओं की फिल्मों को देखने के लिए यहां कतारें लगी रहती थीं, लेकिन ये तस्वीरें अब बदल चुकी हैं. पलेडियम सिनेमा लाल चौक पर ही है, लेकिन आज लोगों को लाल चौक याद है प्लेडियम सिनेमा नहीं. कश्मीर में रूपहले पर्दे का रूप संवारने की कोशिशें हुईं, लेकिन लगातार आतंकवादी घटनाओं ने न फिल्में चली दी और न ही कश्मीर को फिल्मों का खूबसूरत किरदार बनने दिया।

आज भी लोग कश्मीर की तस्वीरों को फिल्मों के माध्यम से देखते हैं, लेकिन अब खूसबूरती की जगह आतंकवाद से हुई बर्बादी ने ले ली है. हाल ही में आई कुछ फिल्मों में कश्मीर में भारतीय सेना की मुश्किलों और हिम्मत को भी बयान किया गया है. ‘जब तक है जान’ और ‘बजरंगी भाईजान’ जैसे फिल्मों में भी कश्मीर को जगह मिली, लेकिन अब ज्यादातर फिल्मों में कश्मीर को मोहब्बत की जमीन के तौर पर नहीं, बल्कि दहशतगर्दी की सरजमीन के तौर पर दिखाया जाता है, लेकिन धारा 370 के खत्म हो जाने के बाद उम्मीद है कि कश्मीर की कहानी फिल्मी पर्दे पर एक बार फिर खूबसूरती से बयान की जाएगी. कश्मीर सिर्फ दिलकश लोकेशन नहीं है, बल्कि अपने आप में खुद एक किरदार है और इस करदार के लिए बदलाव की पटकथा लिखी जा चुकी है।

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