इमरान का ‘नया पाकिस्तान’ और भारत के सामने ‘रिवर्स स्विंग’ का खतरा

इमरान का ‘नया पाकिस्तान’ और भारत के सामने ‘रिवर्स स्विंग’ का खतरा

अजय बोकिल
क्रिकेट में बाउंसर बाॅलर अपने दिमाग और शरीर के तालमेल से डालता है, लेकिन पाकिस्तान के चुनाव में विजेता की तरह उभरे इमरान खान की पाॅलिटिकल बाउंसर में केवल हाथ उनका है, बाकी सब फौज का है। इस आम चुनाव का प्लस पाॅइंट केवल यही है कि पाक में लगातार तीसरी बार कोई चुनी हुई ( दिखावे के लिए ही सही) सरकार सत्ता संभालने वाली है। इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ बहुमत से दूर रहने के बाद भी लगभग तय है कि पूर्व क्रिकेटर इमरान खान ही मुल्क के नए वजीर-ए-आजम होंगे। पाक के इन चुनावों की विश्वसनीयता पर अमेरिका ने शक जताया है तो पाकिस्तान की सभी प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने चुनाव में भारी धांधली का आरोप लगाया है। हकीकत यह है कि वहां चुनाव का ड्रामा ठीक उसी तरह हुआ जिसकी स्क्रिप्ट पाकिस्तानी फौज ने पहले ही लिख दी थी। कहा जाता है कि चुनाव के पहले से इमरान खान खुद को भावी प्रधानमंत्री मान चुके थे। उनकी बाॅडी लैंग्वेज भी पीएम की तरह हो गई थी। कभी क्रिकेट वर्ल्ड कप में पाक को चैम्पियन बनवाने वाले इमरान अब पाकिस्तान को एक बेहतर और सभ्य देश बनाने का वादा कर रहे हैं।
भारत के संदर्भ में इस चुनाव की दो बातें खास हैं। पहला तो वहां कट्टरपंथी धार्मिक पार्टियों को कोई सीट न मिलना और इमरान खान द्वारा पीएम बनने से पहले ही भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ विजन की तर्ज पर ‘नया पाकिस्तान’ बनाने का वादा करना।
भारतीय मीडिया में इस बात को खास तौर पर रेखांकित किया गया कि हाफिज सईद सहित किसी कट्टरपंथी और इस्लामपरस्त पार्टी को पाकिस्तानी वोटरों ने तवज्जो नहीं दी। हाफिज की मिल्ली मुस्लिम लीग पार्टी ने कई उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे। लेकिन कोई जीन नहीं सका। जबकि हाफिज पूरे चुनाव प्रचार में भारत के ‍खिलाफ जहर उगलता रहा। एक और महत्वपूर्ण घोर दक्षिणपंथी पार्टी तहरीक लब्बैक पाकिस्तान है। इसके कर्ता धर्ता खादिम रिजवी हैं। इस पार्टी ने दो महिला उम्मीदवार भी उतारी थीं। लेकिन कोई नहीं जीता। एक और पार्टी है मुत्तहिदा मजलिस अमल। यह भी खेत रही। नतीजों के बाद यह प्रोजेक्ट करने की कोशिश हुई कि इससे पाक की कट्टरपंथी ताकतों को तगड़ा झटका लगा है। लेकिन गहराई से देखें तो वैसा कुछ नहीं है। पाक में मतों की गणना चुनाव के तत्काल बाद ही शुरू हो गई थी, लेकिन पूरे नतीजे देर रात नहीं आए थे। ऐसे में कट्टरपंथी पार्टियों का वोट शेयर कितना रहा है, यह स्पष्ट नहीं है।
हकीकत यह है कि हाफिज जैसे आंतकी नेताअों का चुनाव लड़ने का मकसद जीतना था ही नहीं। ये पार्टियां पाक सेना के इशारे पर मैदान में उतरी थीं। इन्हें केवल नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के वोट काटना था। ताकि कोई स्थापित पार्टी या बड़ा नेता सत्ता में न आ सके। चूंकि सेना इमरान खान को जितवाना चाहती थी, सो जिता दिया।
दूसरा मुद्दा इमरान की ‘नया पाकिस्तान’ थ्योरी और उनके एक जिम्मेदार और स्वविवेक से काम करने वाले प्रधानमंत्री को लेकर है। इमरान खान की जिंदगी उतार चढ़ाव से भरी रही है। मां की तरफ से पठानों के बुर्की कबीले और पिता की अोर से ( बांगला देश युद्ध में भारतीय सेना के आगे सरेंडर करने वाले लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी) के नियाजी कबीले से ताल्लुक रखने वाले छियासठ वर्षीय इमरान ब्रिटेन के आॅक्सफोर्ड में पढ़े हैं। 1971 में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण करने वाले इमरान 1982 में पाक ‍टीम के कप्तान बनें और 1992 में वर्ल्ड कप जितवाया। इसके बाद राजनीति में सफल होने के लिए उन्होने तीन शादियां कीं। एक पश्चिम परस्त क्रिकेटर से वो धीरे धीरे कट्टर इस्लामिक राजनेता बनने लगे। उनकी मुस्लिम आध्यात्मिक गुरू महिला बुशरा से तीसरी शादी इस बात का सबूत है। उनकी दूसरी पूर्व और पत्रकार पत्नी ने इमरान पर कई गंभीर आरोप लगाए। लेकिन लगता है ‍िक पाक जनता और फौज ने उन्हें दरकिनार कर ‍िदया।
भारत में चिंता मिश्रित उत्सुकता इस बात की है ‍िक अब इमरान क्या करेंगे, कैसे करेंगे ? इमरान ने संभवत: मोदी से प्रेरणा लेते हुए शपथ ग्रहण से पहले ही अपने नया पाकिस्तान’ विजन का ऐलान कर ‍िदया है। इसके मुताबिक वे पाक को एक मजबूत, स्वस्थ, शिक्षित और रोजगार देने वाला देश बनाएंगे। वे खर्चे कम करेंगे। पीएम हाउस में नहीं रहेंगे। निवेश लाएंगे। भारत से रिश्ते सुधारेंगे बशर्ते कश्मीर पर बात हो। कश्मीर इमरान के लिए भी कोर इश्यु है। वो भारत से व्यापार भी बढ़ाना चाहते हैं। कश्मीर मुद्दा अलग रखें तो इमरान के ‘नया पाकिस्तान’ और मोदी के ‘न्यू इंडिया’ विजन में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। मोदी का नया इंडिया भी गरीबी, आंतकवाद, बेरोजगारी, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, अस्वच्छता से मुक्त, वि‍कसित और सुदृढ़ भारत की बात करता है। लेकिन मोदी एक मजबूत सरकार और विशाल देश के प्रधानमंत्री है, जबकि इमरान एक मजबूर सरकार के पीएम होंगे। आगे भी उन्हें फौज के बताए रास्ते पर ही चलना है और उसी की बोली बोलनी है। वो ऐसा नहीं करेंगे तो सेना उन्हें तुरंत पद से हटवा देगी। ऐसे में इमरान कोई साहसिक निर्णय लेंगे या भारत से रिश्ते सुधारने कोई लीक से हटकर कदम उठाएंगे, इसकी संभावना न्यून है। पीएम बनने से पहले ही उन्होने राग कश्मीर गाना शुरू कर दिया है। वे भारत से बातचीत चाहते हैं लेकिन इसकी संभावना कम इसलिए है ‍िक भारत आंतकवाद और कश्मीर दोनो पर बात चाहता है। जो कि फौज के दबाव के चलते लगभग असंभव है।
भारत तो क्या पाकिस्तान के भी आतंकवाद से मुक्त होने के कोई आसार नहीं हैं। क्योंकि एक तो इमरान ने खुद अपनी कट्टरपंथी छवि बनाई है। उन्हें तो तालिबान खान भी कहा गया है। ऐसे में भारत से रिश्ते सुधारने हाफिज सईद जैसे आतंकियों पर सख्ती से नकेल डालना इमरान के लिए लगभग असंभव है। वो भारत के साथ व्यापार बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन पाकिस्तान क्या भारत को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देगा? शायद नहीं। कुल ‍िमलाकर इमरान के आने से भारत-पाक रिश्तों में कोई ठोस बदलाव आएगा, इसकी संभावना बहुत कम है। वो कितने गंभीर पीएम साबित होंगे, यह भी अभी तय होना है। क्योंकि उन्होने चुनाव जीतने के बाद जिस अदा से ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ दिया, उससे ऐसा लगा कि कोई भावी राष्ट्राध्यक्ष के बजाए कोई रिटायर्ड खिलाड़ी क्रिकेट स्टेडियम के ग्रीन रूम में गपशप कर रहा हो। वैसे भी इमरान क्रिकेट में रिवर्स स्विंग बाॅलिंग के बादशाह रहे हैं। यह गेंद वैसी होती नहीं है, जैसी कि आती दिखती है। इसे बल्लेबाज को बहुत सोच समझ कर खेलना होता है। फिर इमरान तो फौज के इशारे पर ही रिवर्स स्विंग कराएंगे। लिहाजा भारत को उनके झांसे में नहीं अाना चाहिए। दोनो देशों के रिश्ते सुधरें, यह कौन नहीं चाहता। लेकिन पाक की ‍िकस गेंद को किस तरह खेला जाए, यह तो मोदी भी समझ चुके होंगे।

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