व्हाटसअप का जमाना है, वो दिन गए जब डाकिए से लड़कियां खत लिखवाती थीं ।

व्हाटसअप का जमाना है, वो दिन गए जब डाकिए से लड़कियां खत लिखवाती थीं ।

व्हाट्सअप का जमाना है अब तो ! ऐसे में वो दिन सपनो जैसी बातें है जब आशा पारिख जैसी अनपढ़ ,अंगूठाछाप सुंदरियाँ ,नाच गाकर डाकिये से ख़त लिख दें साँवरिया के नाम बाबू वाली मिन्नतें किया करती थी ! यह ध्यान रखें कि डाकिये को बाबू कहने का यह सारा प्रपंच केवल इसलिये था ताकि उसे अपने मन के बाबू को ख़त लिखने के लिये राज़ी किया जा सके !
डाकिये से मनुहार इसलिये भी करनी होती थी उन्हें कि सब की माली हैसियत कबूतर पालने की होती नहीं थी ! कबूतर के साथ एक लफड़ा और था ! दानों के लालची होते थे कबूतर ! जो भी दाना डाले उसी की छत पर पहुँच जाते थे ! ऐसे में कन्या का ख़त साँवरिया के बदले उसके अपने बाप को भी डिलीवर होने का ख़तरा होता था ! ले दे देकर वही पच्चीस पचास पैसे में मिलने वाले अंतर्देशीय और लिफ़ाफ़े का सहारा था !
आज से सौ पचास साल पहले लड़कियाँ अठारह की बाद में होती थी उसके पहले ही एक अदद साँवरिया का जुगाड़ हो जाता था उनके लिये ! साँवरिया दूसरे ज़रूरी कामों के अलावा ख़त पढ़ने के काम भी आते थे ! साँवरिया को तब भी आसपास नौकरी मिलती नहीं थी ! वह दूर दराज़ के किसी शहर में इसलिये भी नौकरी करने चला जाता था ताकि उसकी सजनी किसी डाकिये को पकड़कर उससे ख़त लिखवा सके !
उस वक्त की सरकारें भी इन अकेली छूट गई सुंदरियों के प्रति काफ़ी संवेदनशील हुआ करती थी ! बहुत से रेलगाड़ियाँ केवल इसीलिये चलाई गई थी ताकि इन अबला नारियों की लिखी चिट्ठियाँ उनके साँवरियों तक पहुँचाई जा सके ! मेल ट्रेन नाम मिला था ऐसी रेलगाड़ियों को ! ये दूसरी ट्रेनों से तेज चलती थी ! इस वजह से बहुत बार साँवरिया बाद में पहुँचता था ,डाकिये से लिखवाये गये ख़त पहले पहुँच जाते थे !
अमूमन डाकिये का काम केवल ख़त पहुँचाना भर था पर व्यवहार कुशल और रसिक क़िस्म के डाकिये ऐसी सुंदर लड़कियों के मीठे आग्रह और मिलने वाले इनाम के चक्कर में उनके ख़त भी ड्रॉफ्ट कर ही देते थे ! ये भरोसेमंद होते थे ! ख़त की बात मन में ही रखने का अभ्यास था उन्हे ! इस मामले में बहुत से डाकियो की इतनी साख थी कि वो लड़की और लडकी की अम्मा दोनो के ख़त एक साथ लिख देने के बावजूद एक दूसरे को मज़मून की कानोकान खबर नहीं होने देते थे !
डॉकिये इंतज़ार करने की चीज़ थे कभी ! उनकी साईकल की घंटी सुनते ही मोहल्ले भर की लड़कियाँ और औरते दरवाज़े पर आ खड़ी होती थी ! हर घर में पैठ थी उसकी ! जिस घर पहुँच जाये बिना चाय पिये जाता नहीं था ! गाँव के विटनरी डॉक्टर और पटवारी के आसपास की हैसियत होती थी उसकी ! पोस्टमैन का निबंध रटे बिना अंग्रेज़ी की वैतरणी पार की जाना मुमकिन था नही तब ! बेरोज़गार लड़के या तो गाँव के डाकिये को पीटना चाहते थे या खुद डाकिया होने के सपने देखते थे !
व्हाट्सअप और ईमेल के जमाने की पीढी ने ना तो वो ख़ाकी वर्दी पहनने वाला डाकिया देखा है ना वो लाल लैटर बॉक्स ही देख सकें है ! उन्हें यह खबर भी नहीं है कि डाकतार विभाग जैसा एक ऑफिस भी होता था ! ये नही है इसलिये अब वैसे सुरीले गाने भी नहीं बनते जो डाकिये को पुचकारने के लिये गाये जाते थे !
सन्दर्भ – ख़त लिख दें साँवरिया के नाम बाबू !
गायिका – आशा भोंसले
गीतकार – आनंद बक्शी
संगीतकार – लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल
फ़िल्म – आये दिन बहार के !

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