दस साल से फ्रिक्वेंसी चोरी कर रहे वन विभाग को मिला लायसेंस, अब खरीदेंगे वायरलैस

दस साल से फ्रिक्वेंसी चोरी कर रहे वन विभाग को मिला लायसेंस, अब खरीदेंगे वायरलैस

भोपाल। वन्यप्राणियों की सुरक्षा के लिए दस साल से वायरलेस फ्रिक्वेंसी चोरी कर रहे वन विभाग को आखिर लाइसेंस मिल गया है। अब टाइगर रिजर्व, अभयारण्यों के लिए डेढ़ हजार वायरलेस सेट खरीदे जाएंगे। विभाग ने इसकी प्रक्रिया भी शुरू कर दी है, जबकि दूसरे चरण में टेरेटोरियल (सामान्य वनमंडल) के लिए ढाई हजार सेट खरीदे जाने हैं। दूरसंचार मंत्रालय ने नया लाइसेंस तो दिया है, लेकिन पुरानी देनदारी माफ नहीं की है। विभाग को 70 करोड़ रुपए चुकाना है, जिसे लेकर करीब 17 साल से विवाद चल रहा है और यही कारण है कि 10 साल पहले मंत्रालय ने वन विभाग को फ्रिक्वेंसी बंद करने को कह दिया था।

जंगलों की सुरक्षा के लिए वर्ष 2010 में लाए गए पीडीए मोबाइल भी कारगर साबित नहीं हुए। आखिर विभाग को वायरलेस को व्यवस्था में वापस लाना पड़ा, लेकिन वर्ष 1991 से फ्रिक्वेंसी शुल्क नहीं चुकाने के कारण वर्ष 2007 में दूरसंचार मंत्रालय ने फ्रिक्वेंसी देने से इनकार कर दिया था। राशि देने के वादे के चलते करीब दो साल विभाग को फ्रिक्वेंसी मिलती रही, लेकिन वर्ष 2010 तक फ्रिक्वेंसी शुल्क का भुगतान नहीं होने के कारण दूरसंचार मंत्रालय ने हाथ खींच लिए।

इस स्थिति को देखते हुए वन विभाग ने वायरलेस के विकल्प के रूप में पीडीए मोबाइल खरीद लिए। वे भी कारगर साबित नहीं हुए। मोबाइल उन्हीं स्थानों पर चले जहां टेलीकॉम कंपनियों का कवरेज था। घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में मोबाइल का कोई उपयोग नहीं हुआ, तो विभाग ने एक बार फिर वायरलेस लेने की मंशा जाहिर की।

तब तक फ्रिक्वेंसी शुल्क की राशि 32 करोड़ से बढ़कर 70 करोड़ तक पहुंच गई। अब इसी राशि को लेकर दोनों विभाग में अनबन चल रही है। ज्ञात हो कि शुल्क राशि पर हर साल चक्रवर्ती ब्याज लगाया जा रहा था। जिस कारण राशि 70 करोड़ रुपए तक पहुंच गई। जबकि वन अफसरों का कहना है कि उन्हें 32 करोड़ रुपए ही देना है।

फ्रिक्वेंसी की होती रही चोरी

जानकार बताते हैं कि दूरसंचार मंत्रालय ने फ्रिक्वेंसी का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी थी। विभाग ने सामान्य वनमंडलों में फ्रिक्वेंसी का इस्तेमाल भी नहीं किया, लेकिन संरक्षित क्षेत्रों में लगातार वायरलेस का उपयोग होता रहा और दूरसंचार मंत्रालय को इसकी भनक तक नहीं लगी। अब जबकि नया लाइसेंस मिल गया है। वन विभाग फिर से फ्रिक्वेंसी के इस्तेमाल के लिए मान्य हो गया है।

सौ से भी कम सेट

वन विभाग के पास वर्तमान में एक सैकड़ा से भी कम वायरलेस सेट बचे हैं। जिससे जंगलों की हिफाजत संभव नहीं है। इसलिए नए सेट खरीदे जाने हैं। विभाग ने 1991 में साढ़े चार सौ सेट खरीदे थे। इसमें से अधिकांश अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं। वहीं शुल्क जमा नहीं होने के कारण विभाग नए सेट नहीं खरीद पा रहा था।

विभाग ने वर्ष 2014 में कोलकाता की एक कंपनी से ढाई हजार सेट खरीदने का अनुबंध कर लिया था और उस कंपनी को करीब दो करोड़ रुपए एडवांस भी दे दिया थे, लेकिन कंपनी के अफसरों को फ्रिक्वेंसी नहीं होने की जानकारी लग गई और उन्होंने सेट देने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, कंपनी ने करीब दो साल सरकारी राशि का इस्तेमाल भी किया, जिसे बड़ी मुश्किल से वापस लिया गया।

दो मंत्री नहीं सुलझा पाए मामला

फ्रिक्वेंसी शुल्क का मामला दो केंद्रीय वन मंत्री भी नहीं सुलझा पाए थे। वर्ष 2012 से दोनों विभागों के बीच फ्रिक्वेंसी विवाद निपटाने के लिए प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश के पूर्व वनमंत्रियों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखे। दो केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावडेकर और अनिल दवे को अधिकारियों ने व्यक्तिगत रूप से बताया। इन मंत्रियों ने पहल भी की, लेकिन विवाद नहीं सुलझा।

वहीं विभागीय अधिकारियों ने अपने स्तर से केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अफसरों से लगातार संपर्क किया। करीब छह साल की मशक्कत के बाद विवाद तो सुलझा, लेकिन दूरसंचार मंत्रालय राशि माफ करने को तैयार नहीं हुआ।

लाइसेंस मिल गया

हमें वायरलेस चलाने के लिए फ्रिक्वेंसी का लाइसेंस मिल गया है। पहले चरण में वाइल्ड लाइफ के लिए वायरलेस सेट खरीदे जाएंगे।

– आलोक कुमार, एपीसीसीएफ, संरक्षण

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